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जन्मभूमि में ही भुला दी गईं क्रांति की दुर्गा, प्रशासन और नेताओं को याद नहीं रही जन्मतिथि

क्रांतिकारी दुर्गा भाभी की जयंती पर शहजादपुर में सन्नाटा, स्वजनों ने चित्र पर माल्यार्पण कर किया नमन

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कौशाम्बी : जिनका नाम सुनकर अंग्रेजी हुकूमत के अधिकारी तक चौकन्ने हो जाते थे, स्वतंत्रता आंदोलन की उसी वीरांगना दुर्गा भाभी की जन्मतिथि पर उनकी जन्मभूमि शहजादपुर में बुधवार को प्रशासनिक और राजनीतिक स्तर पर उदासीनता देखने को मिली। सिराथू तहसील के शहजादपुर गांव में जन्मीं दुर्गावती देवी आगे चलकर क्रांतिकारी दुर्गा भाभी के नाम से देशभर में प्रसिद्ध हुईं। उनके नाम पर जिले में दुर्गा भाभी स्मारक, दुर्गाभाभी सेतु और पुलिस अधीक्षक कार्यालय परिसर में दुर्गा भाभी सभागार भी है, लेकिन उनकी जयंती पर किसी अधिकारी या राजनीतिक दल के प्रतिनिधि के पहुंचने की जानकारी सामने नहीं आई।

इतिहास के पन्नों में दर्ज है कि दुर्गा भाभी का जन्म सात अक्टूबर 1907 को शहजादपुर गांव में पंडित बांके बिहारी के घर हुआ था। बाद में उनका विवाह क्रांतिकारी भगवती चरण वोहरा से हुआ। पति के साथ उन्होंने भी स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाई और क्रांतिकारियों की सहायता की। भगत सिंह को अंग्रेजों की नजर से बचाकर लाहौर से बाहर निकालने में उनकी भूमिका विशेष रूप से उल्लेखनीय मानी जाती है।

नाम से अंग्रेजों में पैदा होता था खौफ

दुर्गा भाभी केवल किसी क्रांतिकारी की पत्नी भर नहीं थीं। उन्होंने स्वयं स्वतंत्रता संग्राम में साहसिक भूमिका निभाई। क्रांतिकारियों के बीच वह ‘दुर्गा भाभी’ के नाम से लोकप्रिय हुईं। उनके साहस, सूझबूझ और जोखिम उठाने की क्षमता ने उन्हें महिला क्रांतिकारियों की अग्रिम पंक्ति में खड़ा किया।

जन्मभूमि में स्मृतियां सिमटती जा रहीं

विडंबना यह है कि जिस गांव की मिट्टी ने देश को ऐसी वीरांगना दी, वहीं उनकी जन्मतिथि पर सरकारी स्तर पर कोई आयोजन नजर नहीं आया। जिले में उनके नाम से जुड़ी स्मृतियां और भवन मौजूद होने के बावजूद उनकी जयंती को लेकर प्रशासनिक स्तर पर पहल न होना लोगों को अखर रहा है। इससे स्वतंत्रता आंदोलन के ऐसे नायकों की स्मृतियों को संजोने के सरकारी दावों पर भी सवाल खड़े होते हैं।

जन्मस्थली का घर भी नहीं बचा

स्वजनों के अनुसार दुर्गा भाभी के जन्म से जुड़ा घर भी अब अपने मूल स्वरूप में मौजूद नहीं है। बताया गया कि इस वर्ष आई तेज बारिश के दौरान वह भवन धराशायी हो गया। इतिहास से जुड़े इस स्थान के संरक्षण की जरूरत लंबे समय से महसूस की जाती रही है।

दुर्गा भाभी ने जीवन के अंतिम वर्ष गाजियाबाद में बिताए। उनका निधन 15 अक्टूबर 1999 में हुआ।

अपनों ने निभाई परंपरा, चित्र पर माल्यार्पण कर किया नमन

शहजादपुर गांव में रह रहे दुर्गाभाभी के भतीजे उदय शंकर भट्ट ने परिवार के साथ किया स्मरण

दुर्गा भाभी की जन्मतिथि को भले ही प्रशासन और राजनीतिक दलों के लोग याद नहीं रख सके, लेकिन उनके स्वजनों ने बुधवार को उनकी स्मृतियों को जीवंत रखा। शहजादपुर में रह रहे उनके भतीजे उदय शंकर भट्ट ने हर वर्ष की तरह इस बार भी सुबह उनके चित्र पर माल्यार्पण कर श्रद्धासुमन अर्पित किए। परिवार के सदस्यों ने उनके जीवन, संघर्ष और देश के लिए किए गए योगदान को याद करते हुए उन्हें नमन किया।

उदय शंकर भट्ट का कहना था कि दुर्गा भाभी जैसी महान क्रांतिकारी को उनकी जन्मभूमि में याद किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि जिस महिला ने देश की आजादी के लिए अपना जीवन समर्पित कर दिया, उनकी जन्मतिथि पर सरकारी स्तर पर कोई प्रतिनिधि श्रद्धांजलि देने नहीं पहुंचा।

उन्होंने बताया कि दुर्गा भाभी का जीवन साहस, त्याग और राष्ट्रभक्ति की मिसाल रहा। उनके संघर्ष और योगदान को नई पीढ़ी तक पहुंचाने की आवश्यकता है। परिवार की ओर से हर वर्ष उनकी जन्मतिथि पर उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित कर इस परंपरा को आगे बढ़ाया जा रहा है।